Monday, 14 September 2015

पड़े हैं नदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी
साहिलों के दरख्तों पे ख़्वाहिशें छोड़ जाएंगी
बिख़र जाएंगे अरमानों के मोती चमकते जुगनुओं की तरह
कुछ आँखों से भी गिर पड़ेंगे टूटे मजनुओं की तरह
अनवरत उठती इन लहरों की कभी तो सुनी जाएगी
पड़े हैं नदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी
                       शहरों से गिरता पानी नदियों को मैला करेगा
                      कौन है इन सब के पीछे प्रश्न ये पहला करेगा
                       तोड़ कर उन बेड़ियों को कोई गुल नया खिलाएगी
                       पड़े हैंनदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी
मैं भी कितना बावला हूँ  राह उनकी देखता हूँ
बैठकर दरिया किनारे बाट जिसकी जोहता हूँ
क्यूँ न चलकर खुद ही कह दूँ अपने दिल की सारी  बात
फिर ना जाने किस घडी और कैसे होगी मुलाकात

मौज में डूबी ये लहरें एक दिन गले लगाएंगी
पड़े हैं  नदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी

                                                         राहुल 

Saturday, 25 July 2015

डरपोक हैं वो लोग जो प्यार नहीं करते ,
ज़रा ग़ौर फरमाइयेगा। …
डरपोक हैं वो लोग जो प्यार नहीं करते।।।
हिम्मत  चाहिए बर्बाद होने के लिए। 
                                                  ....... राहुल

Wednesday, 15 July 2015

नाराज़  नहीं  मैं अपने मुकद्दर  से , 
थोड़ा और  पा गया  होता तो बुरा   क्या था ?
 कसम तो तुमने दे दी मुझे सब भूल जाने की 
वो कसम मैं खा गया होता तो बुरा क्या था ?
काँच की चूड़ियाँ और चुटकी भर सिंदूर जो आज भी लिए बैठा हूँ 
तेरी माँग में सजा गया होता तो बुरा क्या था?
नाराज़  नहीं  मैं अपने मुकद्दर  से , 
थोड़ा और  पा गया  होता तो बुरा   क्या था ?

लिखे कुछ गीत मैंने तनहा तेरी याद में 
सर भी झुकाना भूल गया मंदिर के शंखनाद में 
तेरे प्यार में पागल मैं  बावला 
उम्र भर तेरा साथ पा गया होता तो बुरा क्या था ?

हर तरफ नफरतों का स्वर सुनाई देता है 
खुदगर्ज़ जमाना हमें रवाजोँ की दुहाई देता है 
नफरतों के उन कबीलों को ,रवाजोँ  की दलीलों को 
ग़र  ठुकरा गया होता तो बुरा क्या था ?
माना कि  शहनाई मसर्रत की निशानी है मग़र 
मेरे जनाज़े पे बजा गया होता तो बुरा क्या था ?

नाराज़  नहीं  मैं अपने मुकद्दर  से , 
थोड़ा और  पा गया  होता तो बुरा   क्या था ?

                                               राहुल