Monday, 14 September 2015

पड़े हैं नदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी
साहिलों के दरख्तों पे ख़्वाहिशें छोड़ जाएंगी
बिख़र जाएंगे अरमानों के मोती चमकते जुगनुओं की तरह
कुछ आँखों से भी गिर पड़ेंगे टूटे मजनुओं की तरह
अनवरत उठती इन लहरों की कभी तो सुनी जाएगी
पड़े हैं नदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी
                       शहरों से गिरता पानी नदियों को मैला करेगा
                      कौन है इन सब के पीछे प्रश्न ये पहला करेगा
                       तोड़ कर उन बेड़ियों को कोई गुल नया खिलाएगी
                       पड़े हैंनदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी
मैं भी कितना बावला हूँ  राह उनकी देखता हूँ
बैठकर दरिया किनारे बाट जिसकी जोहता हूँ
क्यूँ न चलकर खुद ही कह दूँ अपने दिल की सारी  बात
फिर ना जाने किस घडी और कैसे होगी मुलाकात

मौज में डूबी ये लहरें एक दिन गले लगाएंगी
पड़े हैं  नदी किनारे  कभी तो लहर  आएगी

                                                         राहुल 

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